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जिंदा रहे तो..
May 15, 2020 • Naresh Rohila

( महामारी के दौर में सोशल मीडिया पर अनेक गीत,कविता, वायरल हो रहे हैं | वर्तमान में मजदूरों की व्यथा को बयां करती ऐसी वायरल होती एक रचना हमारे पाठक सुनील सिंह ने हमें भेजी है | हमें नहीं पता,यह किसने लिखी है,पर जिसने भी लिखी है , बेहद खूबसूरत लिखी है  | हमारी ओर से इस रचना के लेखक का अभिनंदन- सम्पादक )

जिंदा रहे तो फिर आयेंगे...

जिंदा रहे तो फिर से  आयेंगे   बाबू
तुम्हारे शहरों को आबाद करने ।

वहीं मिलेंगे गगन चुंबी इमारतों के नीचे
प्लास्टिक  के  तिरपाल से ढकी  झुग्गियों में  ।

चौराहों पर अपने औजारों के साथ
फैक्ट्रियों से निकलते काले धुंए जैसे होटलों और  ढाबों पर खाना  बनाते ।

बर्तनो को धोते
हर गली हर नुक्कड़ पर फेरियों मे
रिक्शा खींचते।

आटो  चलाते  रिक्शा चलाते पसीने में तर  बतर होकर तुम्हे तुम्हारी  मंजिलों तक पहुंचाते ।

हर कहीं फिर  हम मिल जायेंगे  तुम्हे 
पानी पिलाते गन्ना पेरते ।

कपड़े धोते , प्रेस करते ,   सेठ से किराए पर ली हुई रेहड़ी  पर समोसा तलते या पानीपूरी बेचते ।

ईंट भट्ठों  पर ,
तेजाब से धोते जेवरात को , 
पालिश करते स्टील के बर्तनों को ।

मुरादाबाद ब्राश के कारखानों से लेकर
फिरोजाबाद की चूड़ियों तक ।

पंजाब के हरे भरे लहलहाते  खेतों से   लेकर  लोहा मंडी गोबिंद गढ़ तक।

चाय   बगानों   से लेकर जहाजरानी तक ।

अनाज  मंडियों  मे   माल   ढोते 
हर जगह होंगे हम

बस सिर्फ   एक मेहरबानी कर दो  बाबू  हम पर , इस    बार   हमें अपने  घर पहुंचा दो ।

घर   पर   बूढी  अम्मा  है  बाप है  जवान बहिन है ।
सुनकर खबर महामारी की,  वो बहुत परेशान हैं
बाट जोह रहे हैं सब  मिल  कर  हमारी ,  काका काकी ताया ताई।

मत रोको हमे अब बस  जाने  दो विश्वास जो हमारा तुम  शहर वालों से  टूट चुका उसे वापिस लाने मे थोड़ा हमे समय दो ।

हम भी इन्सान हैं तुम्हारी तरह , वो बात   अलग   है हमारे  तन  पर पसीने की गन्ध के  फटे पुराने कपडे  हैं,  तुमहारे  जैसे   चमकदार  और उजले   कपडे नही।

बाबू  चिन्ता ना करो ,  विश्वास अगर  जमा  पाए  तो  फिर आयेंगे लौट कर ।

जिंदा रहे तो फिर आएँगे लौट कर ।

जिन्दा रहे तो फिर आएँगे लौट कर ।

वैसे अब जीने के उम्मीद तो कम है अगर मर भी गए   तो  हमें  इतना तो हक  दे दो ।

हमें अपने  इलाके की  ही  मिट्टी   मे  समा जाने  दो ।

आपने प्रत्यक्ष  या अप्रत्यक्ष रुप  से  जो  कुछ भी खाने  दिया उसका दिल से  शुक्रिया ।

बना बना कर फूड  पैकेट  हमारी झोली में  डाले  उसका शुक्रिया।

आप भी आखिर कब तक हमको खिलाओगे  ।

वक्त ने अगर ला दिया आपको भी हमारे बराबर फिर हमको   कैसे खिलाओगे ।

तो क्यों नही जाने देते  हो  हमें हमारे घर  और गाँव । 

तुम्हे   मुबारक हो यह   चकाचौंध भरा  शहर   तुम्हारा ।

हमको तो अपनी जान  से प्यारा है भोला भाला  गाँव  हमारा|