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तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ के कपाट खुले
May 20, 2020 • Naresh Rohila

 

ग्रीष्मकाल में छः माह तुंगनाथ मंदिर में होगी पूजा

तुंगनाथ/उखीमठ: 20 मई। तृतीय केदार तुंगनाथ जी के कपाट आज बुद्ववार दिन 11.30 बजे ज्येष्ठ माह अश्विनी नक्षत्र, त्रयोदशी तिथि में विधि-विधान से खोल दिये गये। कपाट खुलने से पूर्व श्री तुंगनाथ जी की उत्सव डोली आज प्रातः 9 बजे चोपता से तुंगनाथ पहुंची। उत्सव डोली को मंदिर परिसर में रखा गया। उत्सव डोली 18 मई को शीतकालीन गद्दी स्थल मक्कूमठ से रवाना हुई थी।

आज प्रात:10.30 बजे से कपाट खुलने हेतु द्वार पूजन एवं भैरवनाथ जी का आवह्वान किया गया। दिन में 11.30 बजे तृतीय केदार तुंगनाथ जी के कपाट खोल दिये गये। श्री तुंगनाथ जी का मंदिर समुद्र तल से 12070 फीट ऊंचाई पर स्थित हैं।सभी मंदिरों से अधिक ऊंचाई पर स्थित है।

इस अवसर पर शोसियल डिसटेंसिंग का पालन किया गया तथा मास्क पहने गये।

 देवस्थानम बोर्ड, हक हकूकधारी एवं प्रशासन के चुनिंदा प्रतिनिधि इस अवसर पर मौजूद रहे।

कपाट खुलने के पश्चात बाबा की समाधि पूजा, रूद्राभिषेक एवं जलाभिषेक किया गया। तथा जन कल्याण की कामना की गयी‌। बाबा तुंगनाथ मंदिर में 

भगवान तुंगनाथ का प्रथम रूद्राभिषेक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की तरफ से संपन्न किया जा रहा है। इस अवसर पर देवस्थानम बोर्ड के सुपरवाइजर यदुवीर पुष्पवान, तहसीलदार जयबीर राम बधाणी, मठाधिपति राम प्रसाद मैठाणी एवं प्रबंधक प्रकाश पुरोहित मौजूद रहे।

श्री तुंगनाथ जी के कपाट खुलने के साथ ही अब उत्तराखंड के चार धामों सहित पंच बदरी एवं पंच केदार के कपाट ग्रीष्मकाल हेतु खुल गये है। कोरोना महामारी से बचाव हेतु अभी चारधाम यात्रा शुरू नहीं की गयी है। प्रदेश के पर्यटन-धर्मस्व मंत्री सतपाल जी महाराज का कहना है कि महामारी समाप्त होने के पश्चात शीघ्र चार धाम यात्रा शुरू होने की उम्मीद है।

उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम बोर्ड के मीडिया प्रभारी डा.मीडिया प्रभारी डा.हरीश गौड़ ने बताया कि उत्तराखंड के चार धामों में श्री बदरीनाथ धाम के कपाट 15 मई, श्री केदारनाथ धाम के कपाट 29 अप्रैल तथा श्री गंगोत्री-यमुनोत्री धाम के कपाट 26 अप्रैल को खुल गये है। द्वितीय केदार मद्महेश्वर जी के कपाट 11 मई तथा चतुर्थ केदार रुद्रनाथ जी के कपाट 18 मई को खुल गये आज श्री तुंगनाथ जी के कपाट खुलने के साथ ही उत्तराखंड के सभी मठ-मंदिरों के कपाट खुल चुके है। सभी जगह शारीरिक दूरी का ध्यान देते हुए रावल तथा पुजारियों द्वारा पूजा-अर्चना की जा रही है।