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व्यंग्य कविता
May 8, 2020 • Naresh Rohila • सप्तरंग

 

सज गयी मधुशाला
सूने गुरुद्वारे, सूना शिवाला,  
सूनी पड़ी हर सू पाठशाला।
कर के बन्द मंदिर-मस्जिद  ,
वो खोल बैठे लो मधुशाला। 
खुश होकर घूम रहा आज ,
सूनी सड़कों पर मतवाला। 
गले लगाकर मिल रहे सब  ,
मुद्दत बाद मिला पीनेवाला। 
भूल गए राशन की लाइन,
देखी कतार दरे - मधुशाला।
राजस्व की याद उसे ही आई,
राशन लाया जो लुंगी वाला।  
क्या करेगा कोरोना उसका ,
हाथ में जिसके हो मधुहाला। 
अर्थव्यवस्था की व्यवस्था में ,
सज गयी फिर से  मधुबाला। 
घर में बैठे-बिठाये लोगों को ,
राह दिखा रही संध्याबाला। 
द्वार खुला आओ पीने वालों ,
कब से खाली बैठी साकीबाला।   
दुःख-दर्द, थकान मिटा अपनी ,
थाम हाथ में हाला का प्याला। 
पी के भूल जाएगा सब कुछ ,
मस्जिद हो, या हो शिवाला। 
क्या सोचे आके मयखाने में,  
बुझा दिल में लगी  ज्वाला।  
पी जब तक है, जिस्म-ओ-जां,
तेरे बाद रोयेगा, रोने वाला।
मौत बंट रही जब बाजारों में,
करेगा क्या, निराश रखवाला।  
• विनोद निराश,देहरादून